उर्दू शायरी · ग़ज़ल

teri mahfil mein teri hi mohabbat khinch lai hai

तिरी महफ़िल में तेरी ही मोहब्बत खींच लाई है

تری محفل میں تیری ہی محبت کھینچ لائی ہے

शायर: Zaheen Shah Taji6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तिरी महफ़िल में तेरी ही मोहब्बत खींच लाई है
मिरा ज़ौक़-ए-नज़र तेरा ही शौक़-ए-ख़ुद-नुमाई है

तजल्ली से कभी दिल की तसल्ली हो नहीं सकती
कहाँ ये आँख मानूस-ए-हिजाबात-ए-ज़ियाई है

मोहब्बत से हर इक शय में हुए आसार-ए-शय पैदा
मोहब्बत की ख़ुदाई है मोहब्बत ही ख़ुदाई है

ख़ुदा याद आ रहा है हुस्न-ए-ईमां۔सोज़-ए-साक़ी से
कमाल-ए-पारसाई आज तर्क-ए-पारसाई है

बहारें फ़र्श हो हो कर बिछी जाती हैं गुलशन में
'उरूस-ए-सुब्ह-गुल हो कर जवानी मुस्कुराई है

'ज़हीन' इस दह्र में है मद्द-ओ-जज़्र-ए-ज़िंदगी इस से
मोहब्बत साज़-ए-दिल पर जिन सुरों से गुनगुनाई है