उर्दू शायरी · ग़ज़ल

teri aankhon se main KHud par ayan hone laga tha

तिरी आँखों से मैं ख़ुद पर अयाँ होने लगा था

تری آنکھوں سے میں خود پر عیاں ہونے لگا تھا

शायर: Badr Muneer6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तिरी आँखों से मैं ख़ुद पर अयाँ होने लगा था
मुझे भी अपने होने का गुमाँ होने लगा था

मैं अपनी ज़ात का सहरा जो तेरे पास लाया
मिरे अंदर भी बारिश का समाँ होने लगा था

'अता मुझ को हुई सद-शुक्र थोड़ी सी उदासी
वगरना मुफ़्त में जी का ज़ियाँ होने लगा था

कहाँ जाते मिरी आँखों से ये आँसू निकल कर
दरीदा-दामनी का इम्तिहाँ होने लगा था

सरापा गोश हो कर जो मुझे सुनता था पहरों
मिरा लहजा भी अब उस पर गिराँ होने लगा था

जुदाई की घड़ी से पेशतर से रंग-ए-मौसम
फिर उस के बा'द हर मंज़र धुआँ होने लगा था