उर्दू शायरी · ग़ज़ल

teri aamad ki lagat baDh rahi hai

तिरी आमद की लागत बढ़ रही है

تری آمد کی لاگت بڑھ رہی ہے

शायर: Fahmi Badayuni7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तिरी आमद की लागत बढ़ रही है
हमारे घर की क़ीमत बढ़ रही है

बिना कोशिश के वुस'अत बढ़ रही है
मिरे शे'रों में हैरत बढ़ रही है

वो जाते वक़्त मुड़ कर देखता है
मिरी जानिब मोहब्बत बढ़ रही है

पुराने दर्द घटते जा रहे हैं
दवाओं की ज़रूरत बढ़ रही है

अपाहिज बच्चे पैदा हो रहे हैं
मियाँ ख़ुश हैं कि उम्मत बढ़ रही है

मिरी आँखों में कुछ होने लगा क्या
तिरी आँखों में हैरत बढ़ रही है

किसी का आना-जाना घट रहा है
अमानत में ख़यानत बढ़ रही है