उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tere kuche mein pahra baDh gaya hai

तिरे कूचे में पहरा बढ़ गया है

ترے کوچے میں پہرہ بڑھ گیا ہے

शायर: Fahmi Badayuni8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तिरे कूचे में पहरा बढ़ गया है
मिरे लुटने का ख़तरा बढ़ गया है

नक़ाब-ए-रुख़ अभी कुछ और उठाओ
मिरी आँखों का ख़र्चा बढ़ गया है

किसी दिन आ के समझौता करा दो
हमारा हम से झगड़ा बढ़ गया है

तुम्हारी सौदे-बाज़ी की बदौलत
हमारा भाव कितना बढ़ गया है

हमारी छोटी-छोटी क्यारियों में
ज़मीं-दारों का हिस्सा बढ़ गया है

क़सीदे मर्सियों में दब गए हैं
चले आओ कि क़िस्सा बढ़ गया है

सभी दीवारें ऊँची हो गई हैं
अब उस के घर का साया बढ़ गया है

मुझे लगता नहीं ये ख़त्म होगा
तिरे सुनने से क़िस्सा बढ़ गया है