उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tere KHayal se fursat jo umr bhar na hui

तिरे ख़याल से फ़ुर्सत जो उम्र भर न हुई

ترے خیال سے فرصت جو عمر بھر نہ ہوئی

शायर: Raaz Muradabadi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तिरे ख़याल से फ़ुर्सत जो उम्र भर न हुई
कब अपने आप से गुज़रे हमें ख़बर न हुई

नहीं कि तेरी तवज्जोह कभी इधर न हुई
मुझे सवाल की जुरअत ही उम्र भर न हुई

ब-क़ैद-ए-होश मोहब्बत अज़ाब दीदा-ओ-दिल
जिगर का ख़ून तो क्या जुरअत-ए-नज़र न हुई

सहर के नाम पे बज़्म-ए-नशात की बरहम
चराग़ हम ने बुझाए मगर सहर न हुई

तजल्लियों ने दिए सैंकड़ों फ़रेब मगर
असीर-ए-दाम मिरी शोख़ी-ए-नज़र न हुई

उफ़ुक़ के पार उजाले हैं सुब्ह-ए-सादिक़ के
हम इंतिज़ार में बैठे रहे सहर न हुई

वतन की ख़ाक से आती है बू-ए-ख़ूँ पैहम
कि पाक राहज़नों से ये रहगुज़र न हुई