उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tere ghurur mere zabt ka sawal raha

तिरे ग़ुरूर मिरे ज़ब्त का सवाल रहा

ترے غرور مرے ضبط کا سوال رہا

शायर: Vijay Sharma4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तिरे ग़ुरूर मिरे ज़ब्त का सवाल रहा
बिखर बिखर के तुझे चाहना कमाल रहा

वहीं पे डूबना आराम से हुआ मुमकिन
जहाँ पे मौज-ओ-सफ़ीने में ए'तिदाल रहा

नहीं कि शाम ढले तुम न लौटते लेकिन
तुम्हारी राह में सूरज ही ला-ज़वाल रहा

फिर अपना हाथ कलेजे पे रख लिया हम ने
फिर उस के पाँव की आहट का एहतिमाल रहा