उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tere dar ki himayat mil gai hai

तिरे दर की हिमायत मिल गई है

ترے در کی حمایت مل گئی ہے

शायर: Fahmi Badayuni7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तिरे दर की हिमायत मिल गई है
मुझे मेरी ज़रूरत मिल गई है

कहाँ पहुँचाएगी दुनिया को जाने
ज़िहानत में जो वहशत मिल गई है

बिछा जाता है बीमार-ए-मोहब्बत
तड़पने की इजाज़त मिल गई है

खनकती चूड़ियाँ देखी हैं जब से
समा'अत में बसीरत मिल गई है

मैं बाज़ी हारने वाला हूँ शायद
हिमायत में हिक़ारत मिल गई है

जिसे छू भी नहीं सकता है कोई
हमें उस की हिफ़ाज़त मिल गई है

ज़माना अब अलग कर के दिखाए
मोहब्बत में मोहब्बत मिल गई है