उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tera yaqin hun main kab se is guman mein tha

तिरा यक़ीन हूँ मैं कब से इस गुमान में था

ترا یقین ہوں میں کب سے اس گمان میں تھا

शायर: Zafar Ghauri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

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तिरा यक़ीन हूँ मैं कब से इस गुमान में था
मैं ज़िंदगी के बड़े सख़्त इम्तिहान में था

पटक के तोड़ दिया जिस पे तेशा-ए-जाँ को
मैं जू-ए-शीर सा पिंहाँ उसी चटान में था

शजर शजर मिरी आमद का मुंतज़िर मौसम
मैं बर्ग-ए-गुल सा हवाओं की किस उड़ान में था

अंधेरी रात में सम्त-ए-सदा पे छोड़ दिया
हवस का तीर जो इस जिस्म की कमान में था

उठा सका न मैं दस्त-ए-तही से पत्थर भी
मता-ए-ग़ैर सा वो काँच की दुकान में था

ये दौर-ए-संग-नज़र इस को पढ़ नहीं पाया
सहीफ़ा दिल का मिरा जाने किस ज़बान में था