उर्दू शायरी · ग़ज़ल

humakti konpalon ko KHushk ghas kar degi

हुमकती कोंपलों को ख़ुश्क घास कर देगी

ہمکتی کونپلوں کو خشک گھاس کر دے گی

शायर: Zafar Ghauri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हुमकती कोंपलों को ख़ुश्क घास कर देगी
हवा दरख़्तों को फिर बे-लिबास कर देगी

शगुफ़्ता फूल हैं महफ़ूज़ रक्खो मौसम से
ये सख़्त धूप तो फूलों का नास कर देगी

सुलगते चाँद सा मैं तेरे साथ साथ रहा
सफ़र की शाम तुझे भी उदास कर देगी

इसी सबब तो मैं दश्त-ए-बला में चुप चुप था
ये आप-बीती तुम्हें बद-हवास कर देगी

नज़र में उड़ती रही यूँ ही गर्द-ए-गुमराही
तो जिस्म-ओ-जाँ को बहम ना-शनास कर देगी

उतर ही आऊँगा इक दिन ख़ला के मस्कन से
हवा को क़ैद ये मिट्टी की बास कर देगी