उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tilism-e-saya-e-hasrat faza-e-hairani

तिलिस्म-ए-साया-ए-हसरत फ़ज़ा-ए-हैरानी

طلسم سایۂ حسرت فضا حیرانی

शायर: Vijay Sharma5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तिलिस्म-ए-साया-ए-हसरत फ़ज़ा-ए-हैरानी
फिर आज तपने लगी है हमारी पेशानी

ये बुत भी ठीक ये तौहीद भी ये कुफ़्र भी ठीक
कहीं पे बर्फ़ कहीं भाप वो कहीं पानी

धँसा हुआ किसी बनफूल का कोई काँटा
हमारी रूह में करता है ख़ुशबू-ए-जानी

हज़ार फूल मेरे बे-धड़कते सीने पर
मगर गई न कहीं दो जहाँ की वीरानी

मुझे न छेड़ मैं उक्ता चुका हूँ दुनिया से
मैं अपने आप का मूरख ख़ुद अपना मैं ज्ञानी