उर्दू शायरी · ग़ज़ल

thi alag rah magar tark mohabbat nahin ki

थी अलग राह मगर तर्क मोहब्बत नहीं की

تھی الگ راہ مگر ترک محبت نہیں کی

शायर: Zafar Gorakhpuri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

थी अलग राह मगर तर्क मोहब्बत नहीं की
उस ने भी सोचा बहुत हम ने भी उजलत नहीं की

तू ने जो दर्द की दौलत हमें दी थी उस में
कुछ इज़ाफ़ा ही किया हम ने ख़यानत नहीं की

ज़ाविया क्या है जो करता है तुझे सब से अलग
क्यूँ तिरे बा'द किसी और की हसरत नहीं की

आए और आ के चले भी गए क्या क्या मौसम
तुम ने दरवाज़ा ही वा करने की हिम्मत नहीं की

अपने अतवार में कितना बड़ा शातिर होगा
ज़िंदगी तुझ से कभी जिस ने शिकायत नहीं की

एक इक साँस का अपने से लिया सख़्त हिसाब
हम भी क्या थे कभी ख़ुद से भी मुरव्वत नहीं की