उर्दू शायरी · ग़ज़ल

thak jata hun roz ke aane jaane mein

थक जाता हूँ रोज़ के आने जाने में

تھک جاتا ہوں روز کے آنے جانے میں

शायर: Charagh Sharma5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

थक जाता हूँ रोज़ के आने जाने में
मेरा बिस्तर लगवा दो मयख़ाने में

उस के हाथ में फूल है मत कहिए कहिए
उस का हाथ है फूल को फूल बनाने में

मैं कब से मौक़े की ताक़ में हूँ उस को
जान-ए-मन कह दूँ जाने अनजाने में

आँखों में मत रोक मुझे जाना है उधर
ये रस्ता खुलता है जिस तह-ख़ाने में

लाद न उस के हुस्न का इतना बोझ 'चराग़'
आ जाएगी मोच ग़ज़ल के शाने में