उर्दू शायरी · ग़ज़ल

teri jafa ka gham hai magar itna gham nahin

तेरी जफ़ा का ग़म है मगर इतना ग़म नहीं

تیری جفا کا غم ہے مگر اتنا غم نہیں

शायर: Laeeq Akbar Sahaab9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तेरी जफ़ा का ग़म है मगर इतना ग़म नहीं
मर जाएँ तेरे वास्ते पागल तो हम नहीं

'इश्क़-ओ-जुनूँ में हौसला मजनूँ से कम नहीं
सहरा की मुश्त-ए-ख़ाक से घबराते हम नहीं

दस्त-ए-रक़ीब में दिए उस ने बदन के ख़म
छू पाए हम तो रेशमी ज़ुल्फ़ों के ख़म नहीं

आँखों में भर के लाया था मंज़र जो देस के
परदेस के ख़राबों में जन्नत से कम नहीं

चक्खी है उस ने जब से मिरे 'इश्क़ की मिठास
अमृत सा अब ज़बाँ में है पहले सा सम नहीं

नफ़रत दग़ा फ़रेब जफ़ा आश्नाइयाँ
क्या क्या सितम-शि'आर ने तोड़े सितम नहीं

लिक्खेंगे शे'र शे'र में जुर्म-ए-जफ़ा तिरा
दिल है दो-लख़्त हाथ हमारे क़लम नहीं

ख़ंजर जफ़ा का सीने में मेरे उतार कर
आया ज़रा भी चश्म-ए-सितमगर में नम नहीं

जौर-ओ-जफ़ा 'सहाब' पे ढाए वो रोज़-ओ-शब
भूले से भी 'इनायत-ए-लुत्फ़-ओ-करम नहीं