उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ab ye kahte ho tum se mohabbat nahin

अब ये कहते हो तुम से मोहब्बत नहीं

اب یہ کہتے ہو تم سے محبت نہیں

शायर: Laeeq Akbar Sahaab7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अब ये कहते हो तुम से मोहब्बत नहीं
जब कोई और जीने की सूरत नहीं

अब तिरा हिज्र बर्दाश्त कैसे करें
हिज्र से बढ़ के कोई क़यामत नहीं

संग-दिल तू ने मारा है तीर-ए-जफ़ा
आइना मेरे दिल का सलामत नहीं

मतलबी शख़्स था साफ़ कह कर गया
अब मुझे तेरी कोई ज़रूरत नहीं

ज़िक्र उस की जफ़ाओं का हर सम्त है
उस की आँखों में फिर भी नदामत नहीं

हर घड़ी ज़हर ही अब उगलते हैं लब
उन के बोसों में अब वो हलावत नहीं

हम 'सहाब' उस को कैसे कहें चाँद सा
इस क़दर चाँद तो ख़ूबसूरत नहीं