उर्दू शायरी · ग़ज़ल

daman-e-dil ke rafu ka jab hunar bhi aaega

दामन-ए-दिल के रफ़ू का जब हुनर भी आएगा

دامن دل کے رفو کا جب ہنر بھی آئے گا

शायर: Laeeq Akbar Sahaab8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दामन-ए-दिल के रफ़ू का जब हुनर भी आएगा
ज़ीस्त की मुश्किल डगर से तू गुज़र भी आएगा

इब्न-ए-आदम मत समझ आसान जन्नत का सफ़र
देखना रस्ते में ममनू'आ शजर भी आएगा

तू मुक़द्दर के लिखे पर दिल से राज़ी होगा जब
तब तबस्सुम तेरे होंटों पर नज़र भी आएगा

भूल कर सब कुछ चले हो देस से परदेस को
रफ़्ता-रफ़्ता याद अपना प्यारा घर भी आएगा

अपनों की यादें लिए निकलेगा हर दिन आफ़्ताब
हिज्र के साए लिए शब में क़मर भी आएगा

बैठे बैठे अपने घर के बाम-ओ-दर चूम आओगे
याद आँगन में लगा बूढ़ा शजर भी आएगा

साथ रह कर ही खुलेंगी ख़ामियाँ और ख़ूबियाँ
जो रहा नज़रों से ओझल वो नज़र भी आएगा

शे'रों में शामिल करो ख़ून-ए-जिगर भी कुछ 'सहाब'
तब कहीं जा कर ग़ज़ल में कुछ असर भी आएगा