उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek jafa-kar ko dil-dar samajh baiThe the

इक जफ़ा-कार को दिलदार समझ बैठे थे

اک جفا کار کو دلدار سمجھ بیٹھے تھے

शायर: Laeeq Akbar Sahaab9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इक जफ़ा-कार को दिलदार समझ बैठे थे
दुश्मन-ए-जाँ था जिसे यार समझ बैठे थे

जिस सितमगर ने मुझे अपना नहीं समझा था
उस को मेरा सभी अग़्यार समझ बैठे थे

हिज्र की रात कटी चाँद को तकते तकते
चाँद को यार का रुख़्सार समझ बैठे थे

मुद्दतों बा'द किया उस ने मोहब्बत को क़ुबूल
हम तो ताख़ीर को इंकार समझ बैठे थे

वस्ल की सुब्ह थे हम 'आलम-ए-मदहोशी में
दुनिया वाले हमें मय-ख़्वार समझ बैठे थे

पीर-ओ-मुल्ला ने तिरे घर को है मिल कर लूटा
जुब्बा दस्तार को किरदार समझ बैठे थे

हश्र के रोज़ था आ'माल से दफ़्तर ख़ाली
ज़ीस्त को दिरहम-ओ-दीनार समझ बैठे थे

आबला-पाई मिली दश्त-ए-मोहब्बत में 'सहाब'
राह-ए-पुर-ख़ार को गुलज़ार समझ बैठे थे

दाद क्या मिलती उन्हें बज़्म-ए-सुख़न में ऐ 'सहाब'
उलझे अफ़्कार को अश'आर समझ बैठे थे