उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ghar pe bharti jab hasin ek naukrani ho gai

घर पे भरती जब हसीं इक नौकरानी हो गई

گھر پہ بھرتی جب حسیں اک نوکرانی ہو گئی

शायर: Laeeq Akbar Sahaab6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

घर पे भरती जब हसीं इक नौकरानी हो गई
घर के मालिक पर फिर उस की हुक्मरानी हो गई

सूख कर काँटा हुआ बेगम की मैं खा खा के मार
तंग शादी की खुली अब शेरवानी हो गई

उस के कपड़ों से बना सकता हूँ मैं तम्बू क़नात
फूल कर कुप्पा मिरी मोटी ज़नानी हो गई

सोचता हूँ दूसरी का पूछ लूँ बेगम से मैं
पहले वाली शेरवानी अब पुरानी हो गई

फिर नहीं रुकती जो पटरी से उतर जाए कभी
अब ज़बाँ की रेल की दुगनी रवानी हो गई

ताक कर बेगम ने मारी टाँके आए सर पे चार
उस को ग़म है चार टुकड़े चाय-दानी हो गई