उर्दू शायरी · ग़ज़ल

teri be-ruKHi meri maut thi hua iltifat kabhi kabhi

तेरी बे-रुख़ी मिरी मौत थी हुआ इल्तिफ़ात कभी कभी

تیری بے رخی مری موت تھی ہوا التفات کبھی کبھی

शायर: Qaisar Haideri Dehlvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तेरी बे-रुख़ी मिरी मौत थी हुआ इल्तिफ़ात कभी कभी
तिरे इल्तिफ़ात की ख़ैर हो कि मिली हयात कभी कभी

रह-ए-आरज़ू में कहीं कहीं मुझे रोक देते हैं हादसे
ग़म-ए-इश्क़ है मिरा मुस्तक़िल ग़म-ए-काएनात कभी कभी

मिरी जुम्बिश-ए-लब-ए-ग़म-ज़दा जो तिरे मिज़ाज पे बार है
मिरे आंसुओं की ज़बाँ से सुन ग़म-ए-दिल की बात कभी कभी

नहीं एक हाल में कुछ मज़ा करो चाशनी भी मुझे अता
मिरी ज़िंदगी के सुकूत में नई वारदात कभी कभी

वो जहाँ कहीं नज़र आ गए बड़ा इत्तिफ़ाक़ हसीं रहा
मुझे तीरगी थी नसीब में मिली चाँद रात कभी कभी

मैं ज़मीं-नवर्द था इश्क़ में मगर ऐसे मोड़ भी आ गए
मह-ओ-मेहर तक मुझे ले गया सफ़र-ए-हयात कभी कभी

तिरा 'क़ैसर' अम्न-ओ-सुकूँ में भी न बचा फ़रेब-ए-जमाल से
तिरी इक निगाह से खुल गया दर-ए-हादसात कभी कभी