उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aah mizrab-e-mohabbat ke siwa kuchh bhi nahin

आह मिज़राब-ए-मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं

آہ مضراب محبت کے سوا کچھ بھی نہیں

शायर: Qaisar Haideri Dehlvi4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आह मिज़राब-ए-मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं
साज़ आहों की इबादत के सिवा कुछ भी नहीं

ज़िंदगी पर जो कभी तुम ने इनायत की थी
अब वो तौफ़ीक़-ए-इनायत के सिवा कुछ भी नहीं

और हासिल हो कोई ग़म तो अजल को समझें
ज़िंदगी राज़-ए-हक़ीक़त के सिवा कुछ भी नहीं

और अफ़साना-ए-माज़ी में तो रखा क्या है
अब सुकूँ लफ़्ज़-ए-रिवायत के सिवा कुछ भी नहीं