उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tera firaq arsa-e-mehshar laga mujhe

तेरा फ़िराक़ अर्सा-ए-महशर लगा मुझे

تیرا فراق عرصۂ محشر لگا مجھے

शायर: Qadir Siddiqi11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तेरा फ़िराक़ अर्सा-ए-महशर लगा मुझे
जब भी ख़याल आया बड़ा डर लगा मुझे

जब भी किया इरादा-ए-तर्क-ए-तअल्लुक़ात
क्या जाने क्यों वो शोख़ हसीं-तर लगा मुझे

परखा तो ज़ुल्मतों के सिवा और कुछ न था
देखा तो एक नूर का पैकर लगा मुझे

ख़ुद अपनी ज़ात पर भी न रह जाए ए'तिबार
ऐ वक़्त हो सके तो वो नश्तर लगा मुझे

क्या जाने किस जहान में बस्ते हैं नर्म-दिल
मैं ने जिसे छुआ वही पत्थर लगा मुझे

इक मर्तबा ज़रूर नज़र फिर से उठ गई
जो क़द भी तेरे क़द के बराबर लगा मुझे

क़िस्मत इसी को कहते हैं फूलों की सेज पर
लेटा जो मैं तो काँटों का बिस्तर लगा मुझे

उस फूल का कलेजा मिला ग़म से पाश पाश
जो फूल देखने में गुल-ए-तर लगा मुझे

दिल हँस के झेल जाए ये बात और है मगर
चरका तिरी निगाह का अक्सर लगा मुझे

दुनिया का ये निज़ाम ये मेआ'र-ए-सीम-ओ-ज़र
कमतर लगा मुझे कभी बद-तर लगा मुझे

उन की गली की बात ही 'क़ादिर' अजीब है
हर शख़्स शे'र-फ़हम-ओ-सुख़नवर लगा मुझे