उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tark-o-talab ke hangamon ko ishq samajhna wahshat hai

तर्क-ओ-तलब के हंगामों को इश्क़ समझना वहशत है

ترک و طلب کے ہنگاموں کو عشق سمجھنا وحشت ہے

शायर: Balraj Hairat7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तर्क-ओ-तलब के हंगामों को इश्क़ समझना वहशत है
इश्क़ तहय्युर बे-पायाँ है इश्क़ मुजस्सम हैरत है

तुम तो यक़ीनन जानते होगे वाक़ई क्या ये हक़ीक़त है
अक्सर लोग कहा करते हैं इश्क़ बड़ा बद-क़िस्मत है

क़ाफ़िले वालो ना-वाक़िफ़ हो शायद इन असरार से तुम
राह-ए-तलब में गाहे-गाहे गुमराही भी ने'मत है

हम दीवाने क्या बतलाएँ हम से न पूछो क्यों यारो
हर तहज़ीब की मेहराबों में ख़ून-ए-बशर की रंगत है

फ़िक्र नहीं है उस उंसुर का नाम मोहब्बत है शायद
जिस से तहज़ीबें बनती हैं जिस से ज़ीस्त इबारत है

रात ने साज़-ए-मह-ओ-अंजुम पर कितनी लोरियाँ छेड़ी हैं
जी करता है अब सो जाएँ ऐ ग़म-ए-हिज्र इजाज़त है

दुनिया को इरफ़ान-ए-मोहब्बत देने वालों में 'हैरत'
जाने कितने लोग हैं जिन को अपने आप से नफ़रत है