उर्दू शायरी · ग़ज़ल

gham-e-nashat do-alam se mawara sa laga

ग़म-ए-नशात दो-'आलम से मावरा सा लगा

غم نشاط دو عالم سے ماورا سا لگا

शायर: Balraj Hairat7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ग़म-ए-नशात दो-'आलम से मावरा सा लगा
वो झुर्रियों से भरा चेहरा आइना सा लगा

तिलिस्म लुत्फ़-ओ-'इनायत का टूटता सा लगा
तुम्हारा रूठ के जाना बड़ा भला सा लगा

वो क्या है कैसे बताएँ बस इस क़दर समझो
कभी बदन कभी ख़ुशबू कभी ख़ला सा लगा

मैं जिस का नाम पता पूछता रहा सब से
वो अजनबी तो मुझी में छुपा हुआ सा लगा

कोई तो बात यक़ीनन थी उस के चेहरे में
जिसे रगों का लहू झाँकता हुआ सा लगा

ये मेरा वहम सही लेकिन ऐसा वहम भी क्या
हर एक शख़्स मुझे ख़ुद से कुछ ख़फ़ा सा लगा

जो नाम विर्द-ए-ज़बाँ आज तक रहा 'हैरत'
वो नाम आज अचानक नया नया सा लगा