उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tarah tarah ke fasane sunane lagti hai

तरह तरह के फ़साने सुनाने लगती है

طرح طرح کے فسانے سنانے لگتی ہے

शायर: Ehtisham ul Haq Siddiqui7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तरह तरह के फ़साने सुनाने लगती है
उड़ूँ तो मेरी ज़मीं छटपटाने लगती है

ग़ुरूर-ए-नस्ल है यक-लख़्त तो न जाएगा
कि लगते लगते ये दौलत ठिकाने लगती है

न जाने कैसी हवा है कि रात होते ही
बदन में आ के मिरे ख़ाक उड़ाने लगती है

मैं अपनी प्यास पे जब सब्र बाँध देता हूँ
तो जो नदी भी मिले आज़माने लगती है

जहाँ जहाँ भी मैं उस से गुरेज़ करता हूँ
वहीं वहीं से वो आवाज़ आने लगती है

ख़याल तक भी अगर उस का नाम आ जाए
वो हाथ चुपके से मेरा दबाने लगती है

वो एक ख़ुशबू है आती नहीं नज़र लेकिन
क़रीब आते ही ख़ुद को बताने लगती है