उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hum shahr-e-nutq ke the wahin ke nahin rahe

हम शहर-ए-नुत्क़ के थे वहीं के नहीं रहे

ہم شہر نطق کے تھے وہیں کے نہیں رہے

शायर: Ehtisham ul Haq Siddiqui5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हम शहर-ए-नुत्क़ के थे वहीं के नहीं रहे
वो चुप लगी हमें कि कहीं के नहीं रहे

हम ख़्वाब देखते थे बहुत आसमान के
आख़िर में ये हुआ कि ज़मीं के नहीं रहे

हम में थे जाने कौन से काँटे उगे हुए
सब के रहे हैं आप हमीं के नहीं रहे

दिल को झुका के दिल से अदा कर दिए गए
सज्दे रहीन सिर्फ़ जबीं के नहीं रहे

दो-चार लोग मेरे हों मेरे लिए बहुत
सौ फ़ीसदी तो अर्श-नशीं के नहीं रहे