उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aur ab aql ka bar nahin gar sah sakte ho

और अब अक़्ल का बार नहीं गर सह सकते हो

اور اب عقل کا بار نہیں گر سہ سکتے ہو

शायर: Ehtisham ul Haq Siddiqui5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

और अब अक़्ल का बार नहीं गर सह सकते हो
दिल के इस पागल-ख़ाने में रह सकते हो

मेरे दिल में रहना रास नहीं आया तो
बे-शक आँख से आँसू बन कर बह सकते हो

तुम सर-ता-पा आग हो मैं हूँ टोटल पानी
साफ़ है मेरे साथ नहीं तुम रह सकते हो

पत्थर-वत्थर ज़ालिम-वालिम बेहिस-वेहस
मुझ को जो भी कहना चाहो कह सकते हो

मिट्टी होता तो पी जाता पर शीशा हूँ
मेरे ऊपर बे-फ़िक्री से बह सकते हो