उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tanz karta hai aaina mujh par

तंज़ करता है आइना मुझ पर

طنز کرتا ہے آئنہ مجھ پر

शायर: Parvez akhtar9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तंज़ करता है आइना मुझ पर
वक़्त कैसा ये आ पड़ा मुझ पर

एक हल्की सी ज़र्ब मारी थी
शहर सारा ही आ पड़ा मुझ पर

ऐसा लगने लगा है अब मुझ को
हर मुसीबत की इंतिहा मुझ पर

जान दे कर ही हो सका है अदा
कई सदियों का क़र्ज़ था मुझ पर

सूरा-ए-नास पढ़ता रहता हूँ
कोई जादू न चल सका मुझ पर

ढूँडने एक भी नहीं निकला
सभी पढ़ते हैं फ़ातिहा मुझ पर

उम्र गुज़री वफ़ा-शिआ'री में
क़त्ल होना भी फ़र्ज़ था मुझ पर

लोग करते गए करम पे करम
क़र्ज़ बढ़ता चला गया मुझ पर

चलता रहता हूँ बिन थके 'परवेज़'
खुलता जाता है रास्ता मुझ पर