उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ishq ko zahr kyon pilawe hai

इश्क़ को ज़हर क्यों पिलावे है

عشق کو زہر کیوں پلاوے ہے

शायर: Parvez akhtar12 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इश्क़ को ज़हर क्यों पिलावे है
इश्क़ तो रास्ता दिखावे है

पाँव नंगे हैं सर भी नंगा है
सूरज ऊपर से खिलखिलावे है

ख़ूब रस्ते बदल के देख लिए
वो हर इक रास्ते में आवे है

चल रहा है अज़िय्यतों का सफ़र
साँस जावे है साँस आवे है

लोग हलकान हो रहे हैं अबस
ज़िंदगी किस के हाथ आवे है

वक़्त इक दाएरे में घूमे है
ये ख़िज़ाँ से बहार लावे है

क्या तअम्मुल है तेरे आने में
अश्क बे-इख़्तियार आवे है

रोज़ होवे है कुछ न कुछ ऐसा
जो मुझे रात भर जगावे है

जीते जी के हैं सब झमेले यार
फ़र्द आवे है फ़र्द जावे है

एक लाशा उधर है डोली में
एक लाशा इधर से जावे है

मेरा हम-ज़ाद ही मुक़ाबिल है
कौन देखो किसे हरावे है

वक़्त हाथों से जा चुका 'परवेज़'
अब कलेजा ही मुँह को आवे है