उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dekho to sahi zist ke imkan bhi honge

देखो तो सही ज़ीस्त के इम्कान भी होंगे

دیکھو تو سہی زیست کے امکان بھی ہوں گے

शायर: Parvez akhtar7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

देखो तो सही ज़ीस्त के इम्कान भी होंगे
शायद कि इसी भीड़ में इंसान भी होंगे

गर्दन पे लगे ज़ख़्म की सोज़िश से खुली आँख
हम सोचते थे जंग के ए'लान भी होंगे

अल्लाह किसी को कभी भूका नहीं रखता
दिल उस ने दिया है तो कुछ अरमान भी होंगे

दुनिया में कोई चीज़ भी बे-वज्ह नहीं है
मैं हूँ तो मिरे वास्ते मैदान भी होंगे

देखो कभी दुनिया तो परेशान न होना
अब ख़ैर से दीदे हैं तो हैरान भी होंगे

नेकी का बदी से है बहुत पास का रिश्ता
इनआ'म के नज़दीक ही बोहतान भी होंगे

लाज़िम है तो मलज़ूम भी होगा यहीं 'परवेज़'
जब ज़ख़्म मिले हैं तो नमकदान भी होंगे