उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tanhai mil saki na ghaDi bhar kisi ke sath

तन्हाई मिल सकी न घड़ी भर किसी के साथ

تنہائی مل سکی نہ گھڑی بھر کسی کے ساتھ

शायर: Tahir Tilhari5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तन्हाई मिल सकी न घड़ी भर किसी के साथ
साया भी मेरे साथ रहा रौशनी के साथ

रौशन हुआ न कोई दरीचा मिरे बग़ैर
इक रब्त-ए-ख़ास रखता हूँ मैं उस गली के साथ

दो दिन की ज़िंदगी में भी धड़का था हश्र का
करते रहे गुनाह मगर बे-दिली के साथ

मैं बे-अमल था फ़र्द-ए-अमल कैसे बन गई
कैसा मज़ाक़ है ये मिरी बेबसी के साथ

मैं उस को छोड़ सकता हूँ 'ताहिर' न वो मुझे
इक ज़िंदगी बंधी है मिरी ज़िंदगी के साथ