उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dil-e-bashar hai ajab do-ruKHi se wabasta

दिल-ए-बशर है 'अजब दो-रुख़ी से वाबस्ता

دل بشر ہے عجب دو رخی سے وابستہ

शायर: Tahir Tilhari7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दिल-ए-बशर है 'अजब दो-रुख़ी से वाबस्ता
किसी के साए से नफ़रत किसी से वाबस्ता

मैं साया हूँ मुझे तारीकियों से क्या लेना
मिरी हयात तो है रौशनी से वाबस्ता

मिरा वजूद है जैसे कटी पतंग कोई
न मुझ से कोई न मैं हूँ किसी से वाबस्ता

चराग़-ए-ज़ख़्म पे यारो नज़र जमाए रहो
हर इक सहर है इसी रौशनी से वाबस्ता

मैं अब तुलू’-ए-सहर से भी काँप उठता हूँ
ये रौशनी भी न हो तीरगी से वाबस्ता

जराहतें हों मिरे जिस्म की कि रूह का कर्ब
हर इक ‘अज़ाब है एहसास ही से वाबस्ता

मैं अपनी सोच के धारे पे बहता रहता हूँ
ये नाव रहती है हर दम नदी से वाबस्ता