उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHalish-e-zaKHm-e-tamanna ka mudawa bhi na tha

ख़लिश-ए-ज़ख़्म-ए-तमन्ना का मुदावा भी न था

خلش زخم تمنا کا مداوا بھی نہ تھا

शायर: Tahir Tilhari12 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़लिश-ए-ज़ख़्म-ए-तमन्ना का मुदावा भी न था
मैं ने वो चाहा जो तक़दीर में लिक्खा भी न था

इतना याद आएगा इक रोज़ ये सोचा भी न था
हाए वो शख़्स कि जिस से कोई रिश्ता भी न था

क्यों उसे देख के बढ़ती थी मिरी तिश्ना-लबी
अब्र-पारा भी न था वो कोई दरिया भी न था

दिल वो सहरा कि जहाँ उड़ती थी हालात की गर्द
ग़म वो बादल जो कभी खुल के बरसता भी न था

तू ने क्यों जागते रहने की सज़ा दी मुझ को
तेरे बारे में कोई ख़्वाब तो देखा भी न था

हो गए लोग ये क्यों मेरे लहू के प्यासे
मैं ने तो आँख उठा कर उसे देखा भी न था

कुछ झिझकती हुई नज़रें भी थीं महव-ए-गुल-गश्त
मैं चमन-ज़ार-ए-तसव्वुर में अकेला भी न था

बाज़ रातों में ये मंज़र भी नज़र से गुज़रा
शम्अ' भी जलती रही घर में उजाला भी न था

कभी बन जाएगी यूँ याद तिरी जुज़्व-ए-हयात
मैं ने इस रुख़ से तिरे बाब में सोचा भी न था

आसमाँ और ज़मीं हद्द-ए-नज़र तक थे मुहीत
हम कहाँ जाते निकल कर कोई रस्ता भी न था

कुछ उमीदें थीं उमंगें थीं तमन्नाएँ थीं
दिल तिरी राह में निकला तो अकेला भी न था

उम्र भर करते रहे घर की तमन्ना 'ताहिर'
और तक़दीर में दीवार का साया भी न था