उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tamam rang jahan iltija ke rakkhe the

तमाम रंग जहाँ इल्तिजा के रक्खे थे

تمام رنگ جہاں التجا کے رکھے تھے

शायर: Zafar Moradabadi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तमाम रंग जहाँ इल्तिजा के रक्खे थे
लहू लहू वहीं मंज़र अना के रक्खे थे

करम के साथ सितम भी बला के रक्खे थे
हर एक फूल ने काँटे छुपा के रक्खे थे

सुकून चेहरे पे हर ख़ुश अदा के रक्खे थे
समुंदरों ने भी तेवर छुपा के रक्खे थे

मिरी उमीद का सूरज कि तेरी आस का चाँद
दिए तमाम ही रुख़ पर हवा के रक्खे थे

वो जिस की पाक उड़ानों के मो'तरिफ़ थे सब
जले हुए वही शहपर हया के रक्खे थे

बना यज़ीद ज़माना जो मैं हुसैन बना
कि ज़ुल्म बाक़ी अभी कर्बला के रक्खे थे

उन्हीं को तोड़ गया है ख़ुलूस का चेहरा
जो चंद आइने हम ने बचा के रक्खे थे

यूँही किसी की कोई बंदगी नहीं करता
बुतों के चेहरों पे तेवर ख़ुदा के रक्खे थे

गए हैं बाब-ए-रसा तक वो दस्तकें बन कर
'ज़फ़र' जो हाथ पे आँसू दु'आ के रक्खे थे