उर्दू शायरी · ग़ज़ल

talKHiyan is mein bahut kuchh hain maza kuchh bhi nahin

तल्ख़ियाँ इस में बहुत कुछ हैं मज़ा कुछ भी नहीं

تلخیاں اس میں بہت کچھ ہیں مزا کچھ بھی نہیں

शायर: Kaleem Aajiz6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तल्ख़ियाँ इस में बहुत कुछ हैं मज़ा कुछ भी नहीं
ज़िंदगी दर्द-ए-मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं

शम्अ' ख़ामोश भी रहते हुए ख़ामोश कहाँ
इस तरह कह दिया सब कुछ कि कहा कुछ भी नहीं

हम गदायान-ए-मोहब्बत का यही सब कुछ है
गरचे दुनिया यही कहती है वफ़ा कुछ भी नहीं

ये नया तर्ज़-ए-करम है तिरा ऐ फ़स्ल-ए-बहार
ले लिया पास में जो कुछ था दिया कुछ भी नहीं

हम को मा'लूम न था पहले ये आईन-ए-जहाँ
उस को देते हैं सज़ा जिस की ख़ता कुछ भी नहीं

वही आहें वही आँसू के दो क़तरे 'आजिज़'
क्या तिरी शाइ'री में इन के सिवा कुछ भी नहीं