उर्दू शायरी · ग़ज़ल

talKHi-e-ayyam rahn-e-jam ki

तल्ख़ी-ए-अय्याम रहन-ए-जाम की

تلخیٔ ایام رہن جام کی

शायर: Pandit Vidya Ratan Aasi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तल्ख़ी-ए-अय्याम रहन-ए-जाम की
बादा-ख़ाने में बसर हर शाम की

बज़्म में साक़ी की चश्म-ए-मस्त ने
शर्म रख ली एक तिश्ना-काम की

काश सुन लेते वो मेरी दास्ताँ
बात रह जाती दिल-ए-नाकाम की

मिट न पाई ज़िंदगी की तल्ख़ियाँ
बादा-नोशी हम ने गो हर शाम की

हम कहाँ थे इस क़दर बे-रंग-ओ-नाम
दोस्तो गर्दिश है सुब्ह-ओ-शाम की

बादा ख़्वारों ने न चलने दी कोई
मय-कदे में गर्दिश-ए-अय्याम की

इस निगाह-ए-मुख़्तसर का शुक्रिया
बात बन आई दिल-ए-नाकाम की

आसी-ए-कम-ज़र्फ़ ने हंगाम में
अंजुमन की अंजुमन बदनाम की