उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tai hua din ki khule sham ke bistar chaliye

तय हुआ दिन कि खुले शाम के बिस्तर चलिए

طے ہوا دن کہ کھلے شام کے بستر چلیے

शायर: Charagh Barelvi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तय हुआ दिन कि खुले शाम के बिस्तर चलिए
पाँव को हुक्म थकन का है कि अब घर चलिए

पहले पहले तो किसी चीज़ से टकराओगे
तब कहीं ज़ेहन कहेगा कि सँभल कर चलिए

चोट देखेंगे तो मंज़िल पे नहीं पहुँचेंगे
लग गई पाँव को जो लगनी थी ठोकर चलिए

ऐसे कितने ही मिलेंगे तुम्हें मंज़िल तक सो
देखना छोड़िए भी मील के पत्थर चलिए

राह में भीड़ डराती है तो घर जाते हैं और
घर की तन्हाई ये कहती है कि बाहर चलिए