उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hum ko rakhni thi so ek chaak pe rakh di miTTi

हम को रखनी थी सो इक चाक पे रख दी मिट्टी

ہم کو رکھنی تھی سو اک چاک پہ رکھ دی مٹی

शायर: Charagh Barelvi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हम को रखनी थी सो इक चाक पे रख दी मिट्टी
कूज़ा-गर जाने कि किस शक्ल ढलेगी मिट्टी

शहर की गलियों में इक शोर था दुनिया दुनिया
क़ब्र-गाहों से सदा आई कि मिट्टी मिट्टी

उस की ज़िद थी कि ढलें उस की ही हम शर्तों पर
और हम ले के चले आए हैं अपनी मिट्टी

एक मुद्दत से कोई शक्ल नहीं मिलती हमें
तू ने किस चाक पे रख दी ये हमारी मिट्टी

हम कहाँ और किसी ज़ात में होते हैं निहाँ
अपनी मिट्टी से नहीं मिलती किसी की मिट्टी

छान कर देखना मिल जाएँगी मेरी किर्चें
तेरे आँगन में जो इक सुब्ह मिलेगी मिट्टी

दश्त ही दश्त नज़र आता है मुझ को ऐ हवा
तू ने डाली है मिरी आँख में कैसी मिट्टी

ख़त्म होता ही नहीं है किसी ख़्वाहिश का तवाफ़
क्यों किसी चाक को मिलती नहीं अच्छी मिट्टी