उर्दू शायरी · ग़ज़ल

suraj bhi sar pe ho to use saeban kahen

सूरज भी सर पे हो तो उसे साएबाँ कहें

سورج بھی سر پہ ہو تو اسے سائباں کہیں

शायर: Badiuzzaman Khawar9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सूरज भी सर पे हो तो उसे साएबाँ कहें
अब दश्त ही को आओ हम अपना मकाँ कहें

हों एक आसमान-ओ-ज़मीं जिस जगह वहाँ
समझें किसे ज़मीन किसे आसमाँ कहें

रिंदों को मय-कदे की सियासत से क्या ग़रज़
जो भी पिलाए हम उसे पीर-ए-मुग़ाँ कहें

चुप बैठ कर भी दोस्तो कटती कहाँ है रात
इस ख़ामोशी में क्यों न कोई दास्ताँ कहें

जब वो हर एक शय में है जल्वा-नुमा तो फिर
क्या बात है कि लोग उसे बे-निशाँ कहें

खुलता नहीं कि कौन हमारा हरीफ़ है
आता नहीं समझ में किसे मेहरबाँ कहें

ज़र्रा भी है लिए हुए सहरा की वुस'अतें
क़तरा भी है वो बहर जिसे बे-कराँ कहें

बे-साख़्ता निकल तो पड़ी है सदा-ए-दिल
अब लोग इस को गीत कहें या फ़ुग़ाँ कहें

'ख़ावर' जब इस की गोद के पाले हुए हैं हम
फिर क्यों न अपने देस को हम अपनी माँ कहें