उर्दू शायरी · ग़ज़ल

gum hun KHalaon mein ki sar-e-asman rahen

गुम हूँ ख़लाओं में कि सर-ए-आसमाँ रहें

گم ہوں خلاؤں میں کہ سر آسماں رہیں

शायर: Badiuzzaman Khawar9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गुम हूँ ख़लाओं में कि सर-ए-आसमाँ रहें
बिछड़े जो हम ज़मीं से तो जाने कहाँ रहें

हाइल हज़ार राह में संग-ए-गिराँ रहें
दरिया हैं हम तो क्यों न मुसलसल रवाँ रहें

ये चाहते हुए भी कि बन जाएँ आइना
आख़िर बदन के पर्दे में कब तक निहाँ रहें

ग़ुर्बत हो हम पे सहल जो यादों के रूप में
तुम भी हमारे साथ रहो हम जहाँ रहें

जी चाहता है रौनक़-ए-बाज़ार देख कर
इस शहर ही में कोई बना कर मकाँ रहें

क़ुर्बत 'अजब नहीं कि दिलों को नसीब हो
जिस्मों के फ़ासले न अगर दरमियाँ रहें

जब मरहले वरा-ए-तख़य्युल हैं और भी
हम क्यों असीर-ए-मंज़िल-ए-वहम-ओ-गुमाँ रहें

हम भी हैं फूल हम पे ज़मीन-ए-चमन के साथ
फ़स्लों के देवता भी ज़रा मेहरबाँ रहें

'ख़ावर' हमारे बा'द बहुत है कि चार दिन
लौह-ए-जहाँ पे सब्त हमारे निशाँ रहें