उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aag hi kash lag gai hoti

आग ही काश लग गई होती

آگ ہی کاش لگ گئی ہوتی

शायर: Badiuzzaman Khawar6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आग ही काश लग गई होती
दो घड़ी को तो रौशनी होती

लोग मिलते न जो नक़ाबों में
कोई सूरत न अजनबी होती

पूछते जिस से अपना नाम ऐसी
शहर में एक तो गली होती

बात कोई कहाँ ख़ुशी की थी
दिल को किस बात की ख़ुशी होती

मौत जब तेरे इख़्तियार में है
मेरे क़ाबू में ज़िंदगी होती

महक उठता नगर नगर 'ख़ावर'
दिल की ख़ुशबू अगर उड़ी होती