उर्दू शायरी · ग़ज़ल

subh-e-ummid ki ek sham jalai gai thi

सुब्ह-ए-उम्मीद की इक शम' जलाई गई थी

صبح امید کی اک شمع جلائی گئی تھی

शायर: Qamar Abbas Qamar7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सुब्ह-ए-उम्मीद की इक शम' जलाई गई थी
इस तरह मम्लिकत-ए-जिस्म बचाई गई थी

कितना बे-फ़ैज़ ज़माना था कि ख़्वाहिश मेरी
गोशा-ए-दिल में तड़पती हुई पाई गई थी

मुद्दतों तुझ पे लुटाता रहा मैं दौलत-ए-दिल
जो किसी और के हिस्से की कमाई गई थी

देखने वालों की आँखों में उतर आती थी
एक तस्वीर जो काग़ज़ पे बनाई गई थी

मेरे माथे पे उभर आते थे वहशत के नुक़ूश
मेरी मिट्टी किसी सहरा से उठाई गई थी

मुझ से मत पूछ शब-ए-शहर-ए-जुनूँ का क़िस्सा
ख़्वाब आते नहीं थे नींद उड़ाई गई थी

चश्म-ए-हैरत ने वो दुनिया भी तो देखी है जहाँ
प्यास दरियाओं की सहरा से बुझाई गई थी