उर्दू शायरी · ग़ज़ल

akela main hi nahin hijr ki sawari mein

अकेला मैं ही नहीं हिज्र की सवारी में

اکیلا میں ہی نہیں ہجر کی سواری میں

शायर: Qamar Abbas Qamar6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अकेला मैं ही नहीं हिज्र की सवारी में
कुछ और लोग भी शामिल हैं शब-गुज़ारी में

नदी से कह दो इधर तिश्नगी बला की है
ये सूख जाएगी सहरा की आब्यारी में

सिपाह-ए-शाम निगाहों को मत उठा लेना
'अली का शेर है ख़ेमों की पासदारी में

कटे दरख़्तों का मैं एहतिजाज देखता हूँ
सफ़ेद ख़ून लगा है तुम्हारी आरी में

निकल के आ जा पस-ए-पर्दा-ए-तसव्वुर से
ये दो चराग़ भी हैं सोज़-ए-इंतिज़ारी में

कई तो मिट गए कितने खँडर बने हुए हैं
मकान अपने मकीनों की सोगवारी में