उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hum apne aapko aise ganwane lagte hain

हम अपने आप को ऐसे गँवाने लगते हैं

ہم اپنے آپ کو ایسے گنوانے لگتے ہیں

शायर: Qamar Abbas Qamar9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हम अपने आप को ऐसे गँवाने लगते हैं
बहुत ख़ुशी हो तो मातम मनाने लगते हैं

अकेला-पन है और ऐसा अकेला-पन जिस में
कोई जो पूछ ले कुछ सब बताने लगते हैं

समझ में आता नहीं जब कोई सवाल हमें
बहाने-बाज़ हैं हम गुनगुनाने लगते हैं

वो बात देखते हैं दिल नहीं समझते हैं
मैं जाओ कहता हूँ तो लोग जाने लगते हैं

बस एक बार हमें वो पुकार लेता है
बदन की क़ैद में हम छटपटाने लगते हैं

किसी किसी पे ही अब ए'तिबार होता है
किसी किसी के ही हम लोग शाने लगते हैं

ये चंद दोस्त बुलाने पे भी नहीं आते
मैं जब बुलाता नहीं हूँ तो आने लगते हैं

इधर से आए तो तुझ तक हम आ गए जल्दी
उधर से आने में वर्ना ज़माने लगते हैं

हमारी रात का इक वक़्त तय है जिस में हम
तमाम बिछड़े हुओं को बुलाने लगते हैं