उर्दू शायरी · ग़ज़ल

is shahr mein kuchh logon se pahchan abhi hai

इस शहर में कुछ लोगों से पहचान अभी है

اس شہر میں کچھ لوگوں سے پہچان ابھی ہے

शायर: Qamar Abbas Qamar7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इस शहर में कुछ लोगों से पहचान अभी है
या'नी कि मिरे होने का इम्कान अभी है

इक शे'र से ख़ाइफ़ हुआ जाता है ज़माना
उस मेज़ पे रक्खा मिरा दीवान अभी है

ये शोर बनेगा किसी बेकस का तराना
दुनिया मिरी ज़ंजीर से हैरान अभी है

ये हिज्र मुसलसल है मगर वस्ल का इम्कान
मैं कह तो रहा हूँ ना मिरी जान अभी है

उस ने मिरी आवाज़ पे लब्बैक पुकारा
इस आलम-ए-ग़ुर्बत में इक इंसान अभी है

लैला-ए-सुख़न तुझ पे भी हैरत है कि तेरा
दिल दर्द के एहसास से अंजान अभी है

मजनूँ से ये कहना कि मिरे शहर में आ जाए
वहशत के लिए एक बयाबान अभी है