उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jab dhup khili KHud ko ajab rah mein paya

जब धूप खिली ख़ुद को अजब राह में पाया

جب دھوپ کھلی خود کو عجب راہ میں پایا

शायर: Qamar Abbas Qamar7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जब धूप खिली ख़ुद को अजब राह में पाया
आगे मिरी परछाईं थी पीछे मिरा साया

यूँ रात गए किस को सदा देते हैं अक्सर
वो कौन हमारा था जो वापस नहीं आया

जब आख़िरी मौक़ा' था कि साहिल पे उतरते
दरिया ने हमें अपनी तरफ़ ऐसे बुलाया

सब ख़ुश हैं तो लगता है ख़ुशी 'आम सी शय है
अच्छा हुआ तू ने मुझे ग़म-ख़्वार बनाया

पहले तो समझ में भी नहीं आया कि क्या है
जब उस को बताया तो मुझे उस ने बताया

हर दर्द की इक हद है और इस हद से ज़ियादा
ये क्या है जिसे सह नहीं पाता हूँ ख़ुदाया

वो ख़्वाब के अंदर का अंधेरा था सो उस ने
सोने न दिया मुझ को हर इक रात जगाया