उर्दू शायरी · ग़ज़ल

subh-dam ka maza nahin lete

सुब्ह-दम का मज़ा नहीं लेते

صبح دم کا مزا نہیں لیتے

शायर: Pandit Vidya Ratan Aasi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सुब्ह-दम का मज़ा नहीं लेते
लोग ताज़ा हवा नहीं लेते

झूट का आसरा नहीं लेते
दर्द वाले दवा नहीं लेते

बरसर-ए-इक़्तिदार हूँ कब से
लोग क्यों फ़ाएदा नहीं लेते

कौन जाने वो दिल से देता हो
हम किसी की दुआ नहीं लेते

बे-झिझक अब मिला करो हम से
आज-कल हम दवा नहीं लेते

जिन के रौशन ज़मीर होते हैं
दूर से ज़ाइक़ा नहीं लेते

इश्क़ होता है अपने बूते पर
इश्क़ में मशवरा नहीं लेते