उर्दू शायरी · ग़ज़ल

socho to qayamat hai chhalawa hai bala hai

सोचो तो क़यामत है छलावा है बला है

سوچو تو قیامت ہے چھلاوا ہے بلا ہے

शायर: Qadir Siddiqi11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सोचो तो क़यामत है छलावा है बला है
देखो तो फ़क़त राह में नक़्श-ए-कफ़-ए-पा है

माना कि तिरे हक़ से तुझे कम ही मिला है
ये भी कभी सोचा है कि क्या तू ने दिया है

मैं क़ाफ़िला-ए-वक़्त के हमराह चलूँ क्या
जो शख़्स है पीछे की तरफ़ देख रहा है

औरों के तक़ाबुल में सदा पस्त रहा हूँ
ये भी मिरी ना-कर्दा-गुनाही की सज़ा है

अब अपने ही माज़ी पे यक़ीं आ नहीं पाता
लगता है ये क़िस्सा भी कभी मैं ने सुना है

दुनिया को जो छोड़ा था तो कुछ और था आलम
दुनिया को जो चाहा तो अजब हाल हुआ है

इस दौर को क्या सई-ए-हिदायत की ज़रूरत
जिस दौर का जो शख़्स है फ़रज़ाना बना है

ये भी मिरी क़िस्मत कि उलझ बैठा मैं इन में
कुछ ऐसे अमल जिन की सज़ा है न जज़ा है

उस ग़म को भला क्यों न मैं सीने से लगाऊँ
वो ग़म जो मिरे दोस्त तिरा हुस्न-ए-अता है

मुमकिन हो तो मिल जाओ किसी हाल में इक बार
अब वक़्त का सूरज है कि जो डूब रहा है

'क़ादिर' को शिकायत नहीं ग़ैरों की रविश से
'क़ादिर' को तो अपनों ही ने मायूस किया है