उर्दू शायरी · ग़ज़ल

siyah kamre mein jab subh ka ujala hua

सियाह कमरे में जब सुब्ह का उजाला हुआ

سیاہ کمرے میں جب صبح کا اجالا ہوا

शायर: Osama Khalid6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सियाह कमरे में जब सुब्ह का उजाला हुआ
ज़मीन-बोस हुआ मैं फ़लक से टपका हुआ

तुम आफ़्ताब को किरनों की भीक देती हुई
मैं एक शब के अँधेरे में साँस लेता हुआ

ज़मीं पे फैली हुई धूप उस शरारे की
और एक साया मिरे साथ साथ बुझता हुआ

किसी ने नींद पहन ली किसी की उतरी हुई
किसी ने ख़्वाब उठाया किसी का फेंका हुआ

ये पहली बार कोई जंग रास आई मुझे
मैं इस तक आ गया दुश्मन शुमार होता हुआ

उदास बैठी हुई धूप सुस्त नाव में है
दरून-ए-दरिया कोई जिस्म तिलमिलाता हुआ