उर्दू शायरी · ग़ज़ल

barahna-pa hai bhaTakti ruhon ko dudh deti hai palti hai

बरहना-पा है भटकती रूहों को दूध देती है पालती है

برہنہ پا ہے بھٹکتی روحوں کو دودھ دیتی ہے پالتی ہے

शायर: Osama Khalid6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बरहना-पा है भटकती रूहों को दूध देती है पालती है
फिर उन के जिस्मों पे क़हक़हे फेंकती है चेहरे उदासती है

दरून-ए-दिल ऐसा लग रहा है कोई बला है बड़ी बला है
जो साँस लेती है आह भरती है बात करने पे मारती है

अजीब मंतिक़ की पारसा है ये हिज्र की शब ये हिज्र की शब
लिपट के सोती है किस के पहलू से किस के पहलू में जागती है

मैं ख़्वाब को चीरने का ख़ंजर छुपा के बिस्तर पे लेटता हूँ
पता नहीं किस की मुख़बिरी पर ये रात जेबें खंगालती है

हमारे पाँव भी झड़ रहे हैं क़यामत-ए-क़ैद-ए-ज़िंदगी में
तुम्हारी आहों की शो'लगी भी हमारी ज़ंजीर काटती है

धड़ाम से गिर पड़ी थी मुझ पर अजीब हैअत की सिर कटी रूह
ये फ़ाहिशा अब न सो रही है न ऊँघती है न खाँसती है