उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sitam par sitam sah rahi hai zamin

सितम पर सितम सह रही है ज़मीं

ستم پر ستم سہہ رہی ہے زمیں

शायर: Tahir Tilhari9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सितम पर सितम सह रही है ज़मीं
मगर मुँह से कब बोलती है ज़मीं

मिरा और इस का है सदियों का साथ
मुझे ख़ूब पहचानती है ज़मीं

ज़माने की हर चीज़ बदली मगर
वही आसमाँ है वही है ज़मीं

बुलाता है ख़ुर्शीद आग़ोश में
ख़ला में मगर नाचती है ज़मीं

हुमकता हूँ मैं चाँद के वास्ते
और अपनी तरफ़ खींचती है ज़मीं

ख़ला की बुलंदी से जब की निगाह
बड़ी ख़ूबसूरत लगी है ज़मीं

कहीं दब गई बर्फ़ के ढेर में
कहीं आग उगलने लगी है ज़मीं

कहीं जिन का कोई ठिकाना नहीं
उन्हें भी जगह दे रही है ज़मीं

चुरा ले न 'ताहिर' कोई फ़न का चोर
ये बिल्कुल अछूती नई है ज़मीं