उर्दू शायरी · ग़ज़ल

shuur-o-fikr ke aise itab TuTte hain

शु'ऊर-ओ-फ़िक्र के ऐसे 'इताब टूटते हैं

شعور و فکر کے ایسے عتاب ٹوٹتے ہیں

शायर: Zafar Moradabadi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

शु'ऊर-ओ-फ़िक्र के ऐसे 'इताब टूटते हैं
खिले बग़ैर ही दिल के गुलाब टूटते हैं

तही हो जेब तो भरते हैं सारे मंसूबे
हिसाब रखते हुए बे-हिसाब टूटते हैं

लहू लहू नज़र आती है दिल की वीरानी
सजे-सजाए जब आँखों से ख़्वाब टूटते हैं

सुकूत-ए-लब पे है वो नग़मगी कि जिस के लिए
सुख़न के रिदम नवा के रबाब टूटते हैं

तिरे वुजूद से होती है जब शनासाई
तमाम 'उम्र के सब इंतिसाब टूटते हैं

नफ़स नफ़स ये बिखरती हयात के मंज़र
हवा के लम्स से जैसे हुबाब टूटते हैं

लबों से लफ़्ज़ निकलते हैं आग की सूरत
जब आगही के मिरी आफ़्ताब टूटते हैं

सर-ए-शु'ऊर मिले हैं मलामतों के हुजूम
जब ए'तिमाद सर-ए-इंतिख़ाब टूटते हैं

हक़ारतों की ज़मीं दफ़्न भी नहीं करती
'ज़फ़र' जब अहल-ए-करम के 'अज़ाब टूटते हैं